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Wednesday, 14 December 2016

आइए, नोटबंदी के बहाने विरोध-विरोध खेलें

जब लोगों के पास करने को कुछ खास नहीं होता, तब वे विरोध-प्रदर्शन करते हैं। खूब, खूब, खूब विरोध करते हैं। सड़क से लेकर संसद तक विरोध की नदियां बहा देते हैं। विरोध की उस नदी में न जाने कितने चले आते हैं, अपने-अपने हाथ-पैर-मुंह धोने। हालांकि कईयों को यह तक पता नहीं होता कि विरोध का असली मकसद या मुद्दा क्या है लेकिन तब भी वो विरोध करने में ऐसे जुट जाते हैं मानो विरोध करना उनका ‘खानदानी पेशा’ रहा हो।

मैं जब भी किसी विरोध करने वाले व्यक्ति, पार्टी या संगठन को देखता हूं, मेरी पहली निगाह उनके चेहरों पर जाकर टिक जाती है। कहते हैं, जुबान अगर कुछ न बोले चेहरा सबकुछ बोल देता है। हल्की मुस्कुराहट लिए उनके चेहरे विरोध की पोल क्षणभर में खोल देते हैं। जो चीखें या आवाजें उनके हलक से निकलती हैं, चेहरे तक आते-आते उल्लास में बदल जाती हैं। वे जब विरोधी टाइप नारे लगा रहे होते हैं, तब भी उनके चेहरे उनके नारों के विपरित ही रिएक्ट करते हैं।

लेकिन यहां उनके चेहरों को पढ़ने को कोशिश कोई नहीं करना चाहता। देखने वालों को उनका सिर्फ विरोध नजर आता है। सिर्फ विरोध। विरोध के मायने न उसे करने वाले समझते हैं, न देखने वाले। यों भी हमारे यहां विरोध के लिए विरोध करने की परंपरा पुरानी रही है। कुछ लोग इसलिए भी विरोध करने सड़कों पर निकल आते हैं ताकि टीवी चैनलों के कैमरों पर उनके चेहरे चमचमाते रहें। वे दरअसल डिजाइनर टाइप विरोधी होते हैं।

अभी हाल विरोधी दलों का सरकार और नोटबंदी के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन चैनलों पर देख रहा था। विरोध वे कर रहे थे, शर्म मुझे खुद पर आ रही थी। कि, हाय! ये मैंने किन-किन एलिट विरोधियों को चुनकर संसद में भेज दिया। वे जब आपस में चेन बना रहे थे, तब जरा उनके चेहरों के हाव-भाव पर गौर फरमाइएगा, सब के सब चिंता-मुक्त थे। हल्की-फुल्की हंसी-ठिठोली सबके चेहरों पर तैर रही थी। मानो- वे विरोध के लिए नहीं बल्कि जनता को अपनी ‘हंसोड़ आत्ममुग्धताएं’ दिखलाने के लिए सड़क पर उतरे हों।

इस वक्त प्रत्येक विरोधी की चिंता में जनता की परेशानी है। यहां तक, चंद बुद्धिजीवि भी जनता की परेशानियों से बेहद आहत हैं। नेता या सांसद तो तब भी सड़क पर आकर विरोध-विरोध खेल लेते हैं किंतु बुद्धिजीवि न के बराबर ही सड़कों पर उतरते हैं। इधर जब से बुद्धिजीवियों ने ‘फेसबुक’ और ‘टि्वटर’ को अपने विरोध का औजार बनाया है, तब से वे अपना विरोध वहीं से जतलाते रहते हैं। चंद बुद्धिजीवि नोटबंदी के खिलाफ शाब्दिक विरोध तो खूब जता रहे हैं मगर इनमें से एक भी जनता की मदद की खातिर उनकी जगह खुद लाइनों में जाकर लगने की हिम्मत नहीं कर पा रहा। भला ऐसे विरोध का क्या मतलब कि ऊपर-ऊपर से ही फां-फूं करते रहो।

चूंकि सोशल मीडिया पर ‘शाब्दिक विरोध’ करना अब ‘फैशन’ बन चुका है तो सब के सब कथित विरोधी मिल-जुलकर विरोध-विरोध खेल रहे हैं। उनमें थोड़ी-बहुत हिरस इस बात की भी है कि ‘तेरा विरोध मेरे विरोध से ज्यादा क्रांतिकारी कैसे!’

विरोध करने का यही सुख है, जब-जहां मौका लगे विरोध करने निकल पड़ो। वो तो गनीमत इतनी रही है कि किसी ने अभी तक मोमबत्तियां हाथों में थामकर विरोध-प्रदर्शन नहीं किया। वरना, यहां तो मोमबत्तियों के बहाने भी विरोधी अपने चेहरे चमका ही लेते हैं।

महीनों से ‘डिनायल मोड’ में पड़े विपक्ष के लिए जनता की परेशानी विरोध का अच्छा अवसर लेकर आई है। जबकि अस्सी फीसद जनता सरकार के फैसले पर अपनी ‘सहमति’ व्यक्त कर चुकी है। हां, उन्हें दिक्कतें तमाम हो रही हैं। बहुतों ने अपनी जानें भी गवाईं हैं, फिर भी, लोग लाइनों में इस विश्वास, इस उम्मीद के साथ डटे हैं कि यह सूरत बदलनी चाहिए। यों भी देश, समाज, राजनीति, सरकार का भविष्य मुठ्ठीभर विपक्षी या कथित बुद्धिजीवि तय नहीं कर सकते, इसे जनता को ही तय करना होता है। हर दफा जीत जनता की ही होती है। आशा है, इस दफा भी जनता ही जीतेगी।

फिर भी, जिन्हें विरोध-विरोध खेलना है शौक से खेलें। पर जनता को न बहकाएं।

1 comment:

  1. सच में .. और जनता सब कुछ सहने को तैयार है ... पर तू कौन मैं खामखा ... हमारे नेता भी जबरन थोप रहें हैं अपने आप को ...

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