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Saturday, 26 November 2016

फिदेल कास्त्रो और कॉमरेडो के आंसू

विश्व के बड़े क्रांतिकारी कम्यूनिस्ट नेता फिदेल कास्त्रो नहीं रहे। 90 साल की लंबी पार खेलकर अंततः उन्होंने दुनिया को ‘अलविदा’ बोल दिया। कास्त्रो के न रहने पर क्यूबा और उसके नागरिकों के गम का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। क्यूबा के वो पूर्व राष्ट्रपति ही नहीं बल्कि एक प्रकार से उनके ‘गॉडफादर’ थे। उनका सारा संघर्ष क्यूबा और वहां के नागरिकों की आजादी को समर्पित रहा था। इस लिहाज से क्यूबा के लोगों का अपने नेता की मौत पर ‘दुखी’ होना लाजिमी है।

लेकिन मैं यह नहीं समझ पा रहा कि फिदेल कास्त्रो के न रहने पर हमारे देश के कॉमरेड क्यों इतने मोटे-मोटे आंसू बहा रहे हैं। उनकी मातमी सूरतों को देखकर ऐसा लग रहा है मानो उन्हीं के बीच का कोई बड़ा नेता उनसे बिछड़ गया हो। तमाम कॉमरेडों की फेसबुक पोस्टों, टीवी पर बयानों को पढ़-सुन चुका हूं, सब के सब कास्त्रो के गम में इतने गमजदा हैं कि जुबान तालू से चिपकी-चिपकी जा रही है।

कॉमरेडो के इतनी तदाद में बहाए गए आंसू मुझसे देखे नहीं जा रहे तो सोचा थोड़ा-बहुत महान कम्यूनिस्ट फिदेल कास्त्रो के विषय में पढ़ ही लिया जाए। कास्त्रो के बारे में नेट पर कुछ पढ़ा-जाना। कास्त्रो का जीवन-संघर्ष बहुत बड़ा है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन 17 साल तक बतौर प्रधानमंत्री और 32 साल तक बतौर राष्ट्रपति रहकर उन्होंने राजनीतिक तौर पर अपने देश और वहां के नागरिकों को अपना ‘बंधक’ ही बनाए रखा। क्या इतने सालों में उन्हें राजनीति में एक भी ऐसा चेहरा नजर नहीं आया, जिसे वे देश की बागडोर सौंप सकें?

दरअसल, देश के नागरिकों पर नेताओं का ‘एकछत्र राज’ ऐसे ही ‘तानाशाही’ के रंग मजबूत करता है। उन्हें हर दफा यही लगता है कि उनसे ‘बेहतर’ कोई नहीं। सो, अपने तौर-तरीकों से देश और जनता को हांकते रहते हैं। याद रखें, हमेशा एक ही विचार या व्यक्ति न केवल देश बल्कि वहां की जनता के लिए भी ‘खतरनाक’ साबित हो सकता है। फिर कम्यूनिस्ट जिस विचार को लेकर चलते हैं वहां सिवाय पूंजीवाद के विरोध, आधुनिकता को शक की निगाह से देखने, विपरित विचारधारा से हद दरजे की नफरत करने के अलावा कुछ नहीं। कास्त्रो का वैचारिक रंग-ढंग भी कुछ ऐसा ही था। जिस प्रकार हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां ‘परिवारवाद’ की शिकार हैं कास्त्रो भी थे। अगर नहीं होते तो अपने बाद अपने भाई राउल कास्त्रो को क्यूबा की सत्ता क्यों सौंपते? क्या कास्त्रो के पास अपने भाई के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं था?

यह जानना भी कितना ‘हास्यास्पद’ है कि कास्त्रो ने अमेरिका के सबसे बड़े ‘दुश्मन’ रह चुके सोवियत यूनियन से- केवल अपने फायदे के लिए- दोस्ती गांठी। उन्होंने सोवियत यूनियन को अमेरिका के खिलाफ क्यूबा में परमाणु मिसाइल बेस बनाने की जगह भी दी, जिसे बाद में अमेरिका-सोवियत यूनियन आपसी समझौते के आधार पर हटा दिया गया। पर, यह वाकया इतिहास में तो दर्ज हो ही गया न कि कास्त्रो अपने निज हित के लिए कुछ भी कर सकते थे। यों भी, हमने देखा है कम्यूनिस्ट बिरादरी अमेरिका से कथित तौर पर ‘नफरत’ ही करती है मगर अपने परिवार का कोई सदस्य अगर वहां नौकरी करने जाता है तो उसे रोकते भी नहीं। आखिर यह किस टाइप का अमेरिका-विरोध है आपका मिस्टर कॉमरेड?

मैंने पढ़ा कि क्यूबा ने अभी भी उपभोक्तावाद, बाजार और पूंजीवाद से काफी दूरी बनाकर रखी है। आज जब पूरा विश्व बाजार और पूंजीवाद की तरफ आशा भरी नजरों से देख रहा है तब क्यूबा की सत्ता ने अपने नागरिकों को उससे वंचित कर रखा है। जबकि हकीकत यह है कि न किसी देश, न वहां की जनता की गाड़ी बिना बाजार और पूंजी के चल ही नहीं सकती। हालांकि बहुत से लिबरल टाइप लोग बाजार और पूंजी को टेढ़ी निगाह से देखते हैं पर उनका जीवन भी टिका इसी पर है। लेकिन क्यूबा का इन सब से दूर रहना साफ बताता है कि वहां एक किस्म की राजनीतिक (कम्यूनिस्ट) तानाशाही है।

कास्त्रो के बारे में एक धारणा यह भी है कि उनके 35 हजार से ज्यादा लड़कियों के साथ ‘सेक्स संबंध’ थे! यह कितना हास्यास्पद है कि यहां कॉमरेड लोग उनके जाने पर मोटे-मोटे आंसू तो बहा रहे हैं किंतु कास्त्रो की सेक्स लाइफ पर न कोई बात करना चाह रहा है न लिखना। क्यों? क्या डरते हैं कि महान कम्यूनिस्ट नेता का ‘अपमान’ न हो जाए? यह भी तो एक प्रकार की ‘स्वामी-भक्ति’ ही है अपने आका के प्रति। क्या नहीं?

कास्त्रो के चाहने वालो को थोड़ा बुरा जरूर लगेगा लेकिन सच यह है कि उनका सारा संघर्ष, सारी क्रांति उनके कथित सेक्स संबंधों के आगे ‘बौनी’ ही साबित होती है। साथ-साथ यह भी खोज का विषय बनना चाहिए कि कास्त्रो के इतने लड़कियों के साथ जो संबंध रहे वो कौन और किन परिवारों से ताल्लुक रखती थीं? क्या उनमें मजबूर या पीड़ित लड़कियां भी तो शामिल नहीं थीं? हां, यह सही है कि सेक्स हर व्यक्ति का निजी मसला होता है मगर जब वो पब्लिक डोमेन में आए फिर वो व्यक्तिगत नहीं रहता। फिर जिस तरह की कास्त्रो की सेक्स लाइफ रही, उस पर सवाल उठना लाजिमी है। मुझे तो ऐसा लगता है कि कास्त्रो का वामपंथ (समाजवाद) और सेक्सपंथ साथ-साथ चलता रहा।

हालांकि यहां जिक्र करना जरूर नहीं मगर जब बात चल रही है तो उल्लेख कर रहा हूं। महात्मा गांधी की सेक्स लाइफ के किस्से भी खासा चर्चिंत रहे। इसका जिक्र उन्होंने अपनी किताब आत्मकथा सत्य के साथ मेरे प्रयोग में किया भी है। चूंकि यह सब पुरुषों की सेक्स लाइफ (भले ही वे बाद में महान कम्यूनिस्ट नेता या राष्ट्रपिता क्यों न बन गए) से संबंधित था तो ज्यादा शोर-गुल नहीं हुआ। आम अवधारणा भी यही रही है कि सेक्स की सारी स्वतंत्रताएं पुरुषों के पास ही हैं। वहीं अगर कोई स्त्री इन सेक्स स्वतंत्रताओं को खुद अपनाने की कोशिश करती है तो उसे ‘चरित्रहीन’ करार दिया जाता है। उसकी इच्छाओं पर तमाम तरह के सवाल उठाए जाते हैं।

सनद रहे, जब मशहूर लेखिका तसलीमा नसरीन ने अपनी आत्मकथा में अपनी सेक्स लाइफ का जिक्र किया था तब कट्टरपंथियों के साथ भारत के कॉमरेडो को भी काफी मिर्ची लगी थी। काफी बुरा-भला कहा गया था तसलीमा को। जब तसलीमा ने सेमी-न्यूड तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली थी और खुद से छोटे एक युवा के साथ अपने अफेयर को पब्लिक किया था तब भी साहित्य-समाज में बहुत ‘हल्ला’ हुआ था। मुझे हैरानी है, तब एक भी कॉमरेड अपनी वैचारिक गुफाओं में से निकल सामने नहीं आया था तसलीमा का बचाव करने। ये बिरादरी तब भी खामोश थी, जब तसलीमा पर ‘फतवा’ जारी हुआ था और उन्हें पश्चिम बंगाल से देश निकाला दे दिया गया था। बड़े ही अजीब हैं हमारे देश के कॉमरेड। जहां बोलना चाहिए वहां बोलते नहीं। जबकि कास्त्रो की मौत पर ‘मातमजदा’ हैं!

साफ है, सेक्स के दायरे पुरुष के लिए कुछ और स्त्री के लिए कुछ हैं आज भी।

बहरहाल, यह तो मानना पड़ेगा कि विश्व ने एक जग-प्रसिद्ध (पक्के) कम्यूनिस्ट नेता को खो दिया है। जिनके विचार और संघर्ष उनके जाने के बाद भी हमारे मानस-पटल पर कायम रहेंगे। कास्त्रो कास्त्रो ही थे। कभी कास्त्रो ने कहा था- ‘क्रांति कोई गुलाबों की सेज नहीं है. यह भूत और भविष्य के बीच का संघर्ष है।‘

अंत में, मैं फिदेल कास्त्रो का कोई बहुत बड़ा जानकार नहीं। जो बातें मेरे दिमाग में- कॉमरेडों के आंसूओं को देखकर- आईं, उन्हें यहां व्यक्त कर दिया। फिदेल कास्त्रो पर और लिखने के लिए उन्हें अभी और जानना बाकी है।

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