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Wednesday, 11 May 2016

पानी पर हाहाकार

फिलहाल, पानी के मसले ने हमें पानी-पानी कर रखा है। आकाश से लेकर पताल तक पानी के लिए 'हाहाकार' मचा है। आलम यह है कि एक दिन पानी मिलने के बाद अगले दिन मिलेगा या नहीं; कुछ नहीं पता। लंबी-लंबी लाइनों में लोग पानी के लिए यों इंतजार करते दिखते हैं मानो कोई राशन की दुकान हो। अभी तक पानी पाने के लिए 'संघर्ष' हो रहा था, अब लगता है, अगला 'युद्ध' ही पानी के लिए लड़ा जाएगा।

फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं जिनके लिए पानी का कोई मोल नहीं। दिल खोलकर पानी ऐसे खर्च करते हैं मानो पानी की खेती का लाइसेंस हो उनके पास। खुद के नहाने से लेकर गाड़ी की धुलाई तक में बड़ी बेदर्दी से पानी खर्च करते हैं। कभी टोको तो उत्तर मिलता है, वाटर टैक्स दे रहे हैं तो क्या खर्च नहीं करेंगे? हमारे मोहल्ले में एक सज्जन हैं। वे सुबह-शाम खूब पानी डाल-डालकर जब तक अपने घर के बाहर की सड़क धो नहीं लेते, उनकी रोटी हजम नहीं होती। सड़क को पानी से इतना धोते हैं, इतना धोते हैं कि अड़ोसी-पड़ोसी तक भुनभुनाने लगते हैं। मगर क्या करें, पानी बहाना साहब की आदत है सो है।

पानी की बर्बादी के मद्देनजर अब तक बहुत कहा गया है। यहां तक कि कोर्ट ने भी सरकार को फटकार लगाई है। मुंबई में हो रहे आइपीएल मैचों को 30 अप्रैल के बाद वहां से बाहर करवाने के निर्देश भी दिए हैं। इतने पर भी न तो पानी का बेमतलब बहना रूक पा रहा है न किल्लत। लातूर और बुंदेलखंड के हालात तो इतने खराब हैं कि लोगों को नहाने का तो छोड़िए पीने का पानी भी मयस्सर नहीं। लोग खटिया पर बैठकर नहा रहे हैं ताकि अतिरिक्त पानी को स्टोर कर अन्य काम में लिया जा सके।

पानी की कमी के ये दयनीय हालात कोई साल दो साल या महीने दो महीने में नहीं बने हैं। जिस प्रकार से भू-जल का दोहन जारी है। धरती के गर्भ से जिस निर्मता के साथ पानी को मोटरों द्वारा खींचा जा रहा है, उसने आज हमें उस स्थिति में पहुंचा दिया है कि लोग पानी के वास्ते लड़ाई-झगड़े तक पर उतारू हो गए हैं। गांवों-देहातों में जो स्थिति है सो है, शहरों का हाल भी बहुत बुरा है। पानी निकालने के लिए इतनी गहराई तक बोरिंग की जा रही है कि जमीन की आंतें तक सुखने लगी हैं।

शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब गिरते भू-जल स्तर से संबंधित खबरें अखबारों में न आती हों। तमाम तरह के आंकड़ें ये बताने के लिए काफी हैं कि मनुष्य ने अपनी निजी सुविधाओं के लिए जल, जंगल, जमीन का किस बेरहमी से दोहन किया है। मगर फायदा क्या? प्रकाशित आंकड़ों को देखकर, थोड़ा अफसोस व्यक्त कर, सरकार और इंसान की अड़ियल प्रवृति को गरिया कर फिर सब अपने-अपने कामों में लग जाते हैं। चिंताएं महज चिंताएं बनकर ही रह जाती हैं। उन पर अमल न के बराबर ही हो पाता है।

गिरते जलस्तर या पानी की बर्बादी के लिए सरकारें या इंसान अगर वाकई गंभीर होते तो शायद आज हालात ऐसे न होते। यहां तो सब अपनी-अपनी राजनीतिक एवं व्यक्तिगत सुविधाओं को साधने में लगे हुए हैं। नेता बिरादरी जनता की चौखट पर आकर पानी या रोजगार देने का वायदा तो बहुत जोश से कर जाती है लेकिन चुनाव जीतते ही सारे वायदे जुमले में तब्दील हो जाते हैं। चूंकि जनता का काम सरकार और नेता का मुंह ताकना है सो ताक रही है।

एक तरफ पानी की मार, दूसरी तरफ सूखे का वार इस स्थिति में सबसे अधिक बदत्तर हालात तो किसानों के हैं। साहूकारों से लिया कर्ज किसान समय पर चुका नहीं पाता और आत्महत्या कर लेता है। कैसी विडंबना है, देश का अमीर वर्ग बैंक से लिया कर्ज न चुकाए कोई फर्क नहीं पड़ता मगर किसान का हजार रुपया भी माफ करना उसे मंजूर नहीं। मुझे डर है, आगे कहीं आत्महताएं पानी की किल्लत के लिए न होने लगें। क्योंकि हालात ऐसे ही बनते जा रहे हैं।

पानी की बर्बादी को रोकने के लिए कहना, यह काम सिर्फ सरकार या कोर्ट का नहीं बल्कि सबसे पहला हमारा फर्ज होना चाहिए। जहां पानी भरपूर मात्रा में है, वहां के बादिशों को पहल करनी होगी कि वे अतिरिक्त पानी की बर्बादी रोकें। ताकि बचाए गए पानी का इस्तेमाल उन लोगों के लिए हो, जहां पानी की भीषण कमी है।

पानी को बचाने की कवायदें ही लातूर और बुंदेलखंड जैसी जगह के लोगों को जीवन दे पाएंगी। अपने बारे में तो सब सोचते हैं, अब जरा गंभीरता के साथ पानी की कमी से तड़प रहे लोगों के बारे में भी सोचे लें।

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