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Wednesday, 29 March 2017

खुशहाली पर ग्रहण

इस पर यकीन करने के लिए कि ‘भारत कम खुशहाल देश है’ दिमाग पर अतिरिक्त लोड डालने की जरूरत नहीं। हालिया सर्वे ने इस बात की साफ पुष्टि कर दी है। जिक्र तो हालांकि हर किताब और ग्रंथ में यही मिलता है कि भारत या भारत के लोगों से खुशहाल इस दुनिया में कोई मुल्क नहीं है। किंतु 21वीं सदी तक आते-आते सीन काफी कुछ बदल चुका है।

भारत के कम खुशहाल होने के कारण तमाम हैं। कुछ कारण (इन्हें आप श्योर-शोर्ट न मानें) मेरे जहन में बार-बार आते हैं, जिनकी वजह से भी देश के नागरिकों की खुशहाली पर ग्रहण लगता जा रहा है।

कहने वाले तो झट्ट से सोशल मीडिया को खुशहाली का खलनायक बता डालते हैं। जबकि सोशल मीडिया ने तो हमें आपस में परस्पर जोड़ने का काम किया है। हमारी दोस्तियों एवं लेखन को विस्तार दिया है। न्यू डिजिटल इंडिया की ओर धकेला है। फिर भी, कुछ लोग अगर सोशल मीडिया को अपने अवसाद या तू-तू मैं-मैं का प्लेटफॉर्म बना लेते हैं फिर तो इसमें हकीम लुकमान भी कुछ नहीं कर सकते। सब दिमाग-दिमाग की बातें हैं।

हमारी खुशहाली को बे-सिर-पैर की चिंताएं लील रही हैं। मसलन- हम मोबाइल की स्क्रीन पर स्क्रेच पड़ने से चिंतित हो जाते हैं। बाथरूम में कॉकरोच मिलने पर चिंतित हो उठते हैं। फेसबुक पर कम लाइक मिलने से हमारी चिंताएं जाग्रत हो जाती हैं। ट्वीट को अगर रि-ट्वीट न मिले तो हम डिप्रेशन में आ लेते हैं। सिर में पांच-सात जुएं मिल जाना हमारी चिंता का सबब बन जाता है।
पड़ोसी का घर के पिछवाड़े कूड़ा डालना हमें क्रोधित कर देता है। गर्लफ्रेंड के साथ दोस्त के अफेयर को लेकर व्यथित हो उठते हैं। पड़ोस की भाभी का सुबह-शाम छत पर कपड़े सुखाने न आना हमें परेशान कर जाता है। चर्जर के न मिलने पर तो हम इतने अधिक चिंतित हो उठते हैं मानो हाईस्कूल का रिपोर्ट-कार्ड नाली में बह गया हो।

इस प्रकार की और भी कई किस्म की चिंताएं-परेशानियां हैं जो निरंतर हमारी खुशहाली का बैंड बजा रही हैं। वैसे, देखा जाए तो ये चिंताएं हैं कुछ भी नहीं। लाइफ में थोड़ा-बहुत ऊंच-नीच तो चलता रहता है। लेकिन क्या करें खुशहाली से कहीं ज्यादा हमारा ध्यान अपनी चिंताओं को इस-उस से जग-जाहिर करने पर जो रहता है।

सबसे खास वजह एक यह भी है कि हमने, दूसरों पर जाने दीजिए, खुद पर ही हंसना छोड़ दिया है। अगर कोई हम पर हंसता है तो हम अगले की हंसी का इतना बुरा मान जाते हैं मानो उसने हमारा मकान अपने नाम लिखवाने का फरमान जारी कर दिया हो। हंसी-मुस्कुराहट काम के बोझ तले दब कर दम तोड़ रही है। किस्म-किस्म की बीमारियां और बेबसियां खुशहाली को निपटा रही हैं। ऐसे में क्या खाक खुश रहेंगे हम?

बड़ों के साथ-साथ हमने बच्चों के बचपन की खुशहाली को भी कहीं का नहीं छोड़ा है। बच्चे के दो-ढाई साल का होते ही उसे स्कूल और किताबों के बंधन में ऐसा बांध देते हैं कि वो चाहकर भी खुश नहीं रह पाता। करियर की अंधी दौड़ उन्मुक्त जीवन की सबसे बड़ी बाधा है।

इसीलिए कह रहा हूं, सर्वे पर टसूए न बहाइए। खुशहाली हमसे दूर जा चुकी है। लेकिन अभी हम इतनी दूर भी नहीं गई है कि उसे वापस लाया नहीं जा सकता। अगर ला सकते हैं तो गई खुशहाली को पुनः अपने चेहरों पर लौटा लाइए वरना फिर मत कहिएगा कि खुशी की रौशन इतना मदम-सी क्यों पड़ती जा रही है हमारे आसपास।

क्यों न जीवन को ‘उत्सव’ की तरह जिया जाए। जैसा- ओशो अक्सर अपने प्रवचनों में कहते रहे हैं। जीवन जब उत्सव बन जाएगा फिर खुशी और खुशहाली हमारे पास से कभी जाने नहीं पाएगी।

Monday, 23 January 2017

सोशल मीडिया पर विरोध के बहाने

विरोध अब ‘जमीन’ पर कम, ‘सोशल मीडिया’ पर अधिक नजर आता है। एक तरह से- विरोध के नाम पर- यहां आपस में ‘ज़बानी दंगल’ छिड़ा ही रहता है। विरोध के बीच विचारधाराएं कोई जगह नहीं रखतीं। या यों कहिए कि सोशल मीडिया किसी प्रकार की विचारधारा को नहीं मानता। यहां विरोध के तरीके इतने अजीबो-गरीब हैं, कभी-कभी समझ ही नहीं आता कि विरोध क्यों और किसलिए किया जा रहा है। चूंकि सब विरोध कर रहे होते हैं तो दूसरे भी बहती गंगा में हाथ धोने निकल पड़ते हैं, बिना समझने-जाने।

अपवादों को छोड़ दें तो सोशल मीडिया पर छिड़े रहने वाले विरोध के संग्राम पर भाषाई शालीनता अभी भी दूर की कौड़ी है। यहां असहमति या विरोध जतलाने पर विरोधी लोग व्यक्तिगत धज्जियां उड़ाने से जरा भी नहीं चूकते। विरोध को सुनने या समझने का शऊर न विरोधियों के पास है न ट्रोलर्स के। खासकर, राजनीतिक मुद्दों या बहसों के बीच भाषाई बिगाड़ सबसे अधिक देखा व सुना जाता है।

सोशल मीडिया पर दो ही चीजें का दबदबा रहता हैं या तो आप किसी राजनीतिक दल के समर्थक (बल्कि अंध-समर्थक कहना ज्यादा ठीक होगा) हो या फिर विरोधी। आपसी संवाद में यहां बीच का रास्ता कोई नहीं होता। इधर कुछ सालों में जिस तेजी के साथ सोशल मीडिया पर राजनीति का वर्चस्व बढ़ा है, उसे देखकर लगता ही नहीं कि यहां इसके अतिरिक्त कुछ और भी संभव है। यहां हर दूसरी दीवार राजनीति या राजनीतिक दलों या नेताओं के कथित प्रवचनों से सनी नजर आती है। मतलब, जनता के हक की लड़ाई को जिन्हें जमीन पर लड़ना चाहिए था, वे अपने-अपने विरोधियों से सोशल मीडिया पर लड़ रहे हैं। एक-दूसरे से ज़बानी दंगल हो रहा है। समर्थक को भक्त और विरोधी को अ-भक्त होने के खिताब बांटे जा रहे हैं। अजीब माहौल बना दिया गया है सोशल मीडिया पर।

अच्छा, कुछ लोगों का काम यहां सिर्फ विरोध करना ही होता है। उनके स्टेटस को पढ़कर कभी-कभी तो लगता है कि वे दुनिया में आए ही इसीलिए हैं ताकि हर बात का विरोध कर सकें। यानी, उन्हें खराब का तो विरोध करना ही है साथ-साथ अच्छे का भी। विरोध के बीच वे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को भी ले ही आते हैं। सिक्के का एक ही पहलू देखते हैं, दूसरे को यों नजर-अंदाज कर जाते हैं मानो वो बेकार की चीज हो। बहुत हद तक इस तरह के कथित विरोधी लोग भी सोशल मीडिया पर बहस और संवाद के रिश्ते को तोड़ने के लिए जिम्मेवार हैं।

अभी हाल बैंगलौर में लड़कियों के साथ हुई छेड़खानी की वरदातों पर भी सोशल मीडिया पर किस्म-किस्म का विरोध खूब देखने-पढ़ने को मिला। गजब यह है कि यहां हर आदमी घटना पर अपना गुस्सा या विरोध खुलकर जतला रहा है किंतु समस्या का तार्किक समाधान किसी ने सामने नहीं रखा। ज्यादातर फेमिनिस्टों का एक ही राग-रंग था कि पुरूषों के खिलाफ जमकर विष-वमन करो या फिर उन्हें सरेआम नापुंसक बना डालो।

तो क्या ऐसा करने से महिलाओं के खिलाफ होने वाली घटनाएं कम या खत्म हो जाएंगी? ऐसा कर आप समाज को हिंसक ही बनाएंगे। फेमिनिस्टों का तीखा विरोध अपनी जगह जायज है मगर आप एक ही लाठी से पूरे पुरूष समाज को नहीं हांक सकतीं। हो दरअसल यही रहा है कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों को भी सोशल मीडिया पर हवा देकर कुछ दिनों तक विरोध-विरोध का खेल चलता है। फिर सब दूसरी घटना के होने तक शांत होकर बैठ जाते हैं। ये मुद्दे जमीन पर न के बराबर ही आ पाते हैं। अगर आ भी जाते हैं तो रस्म-अदायगी के बाद उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। पिछले दिनों निर्भया के मामले में भी हम विरोध के उबाल को चढ़ते-उतरते देख चके हैं। लेकिन हुआ क्या? तब से अब तक महिलाओं के प्रति हिंसा के परिपेक्ष्य में हालात बिगड़े ही हैं, सुधरे नहीं।

ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया पर विरोध के बहाने मुद्दों को सुलझाया नहीं जा सकता। सुलझ सब सकता है मगर मुद्दे कुछ दिनों हवा में उछलने के बाद निस्तेज पड़ जाते हैं। अब देखिए न, बीएसएफ और सीआपीएफ के जिन जवानों के वीडियो- खराब खाने और सुविधाओं को लेकर- सामने आए हैं, हां उनका विरोध तो खूब हो रहा है लेकिन उतनी ही शिद्दत के साथ इसे दबाने की कोशिशें भी जारी हैं। न तो सरकार का नजरिया स्पष्ट दिख रहा है न सेना के आला अधिकारियों का। बस सोशल मीडिया पर हर कोई अपना विरोधी तीर लेकर खड़ा है वार करने को। क्या इतने मात्र से चीजें सुधर जाएंगी?

अन्यथा न लें लेकिन सच यही है कि सोशल मीडिया पर होते रहने वाला विरोध महज भाषाई या शाब्दिक दंगल से आगे नहीं बढ़ पाता। उन लोगों के लिए यह रामबाण सिद्ध होता है, जो सोशल मीडिया पर आए ही विरोध के बहाने अपनी राजनीति को चमकाने हैं। फिर ऐसे ‘तुरंता विरोध’ का कोई अर्थ-मतलब नहीं है, जहां ‘मुद्दे’ नहीं सिर्फ ‘हवाबाजी’ ही प्राथमिकता में हो।

Wednesday, 14 December 2016

आइए, नोटबंदी के बहाने विरोध-विरोध खेलें

जब लोगों के पास करने को कुछ खास नहीं होता, तब वे विरोध-प्रदर्शन करते हैं। खूब, खूब, खूब विरोध करते हैं। सड़क से लेकर संसद तक विरोध की नदियां बहा देते हैं। विरोध की उस नदी में न जाने कितने चले आते हैं, अपने-अपने हाथ-पैर-मुंह धोने। हालांकि कईयों को यह तक पता नहीं होता कि विरोध का असली मकसद या मुद्दा क्या है लेकिन तब भी वो विरोध करने में ऐसे जुट जाते हैं मानो विरोध करना उनका ‘खानदानी पेशा’ रहा हो।

मैं जब भी किसी विरोध करने वाले व्यक्ति, पार्टी या संगठन को देखता हूं, मेरी पहली निगाह उनके चेहरों पर जाकर टिक जाती है। कहते हैं, जुबान अगर कुछ न बोले चेहरा सबकुछ बोल देता है। हल्की मुस्कुराहट लिए उनके चेहरे विरोध की पोल क्षणभर में खोल देते हैं। जो चीखें या आवाजें उनके हलक से निकलती हैं, चेहरे तक आते-आते उल्लास में बदल जाती हैं। वे जब विरोधी टाइप नारे लगा रहे होते हैं, तब भी उनके चेहरे उनके नारों के विपरित ही रिएक्ट करते हैं।

लेकिन यहां उनके चेहरों को पढ़ने को कोशिश कोई नहीं करना चाहता। देखने वालों को उनका सिर्फ विरोध नजर आता है। सिर्फ विरोध। विरोध के मायने न उसे करने वाले समझते हैं, न देखने वाले। यों भी हमारे यहां विरोध के लिए विरोध करने की परंपरा पुरानी रही है। कुछ लोग इसलिए भी विरोध करने सड़कों पर निकल आते हैं ताकि टीवी चैनलों के कैमरों पर उनके चेहरे चमचमाते रहें। वे दरअसल डिजाइनर टाइप विरोधी होते हैं।

अभी हाल विरोधी दलों का सरकार और नोटबंदी के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन चैनलों पर देख रहा था। विरोध वे कर रहे थे, शर्म मुझे खुद पर आ रही थी। कि, हाय! ये मैंने किन-किन एलिट विरोधियों को चुनकर संसद में भेज दिया। वे जब आपस में चेन बना रहे थे, तब जरा उनके चेहरों के हाव-भाव पर गौर फरमाइएगा, सब के सब चिंता-मुक्त थे। हल्की-फुल्की हंसी-ठिठोली सबके चेहरों पर तैर रही थी। मानो- वे विरोध के लिए नहीं बल्कि जनता को अपनी ‘हंसोड़ आत्ममुग्धताएं’ दिखलाने के लिए सड़क पर उतरे हों।

इस वक्त प्रत्येक विरोधी की चिंता में जनता की परेशानी है। यहां तक, चंद बुद्धिजीवि भी जनता की परेशानियों से बेहद आहत हैं। नेता या सांसद तो तब भी सड़क पर आकर विरोध-विरोध खेल लेते हैं किंतु बुद्धिजीवि न के बराबर ही सड़कों पर उतरते हैं। इधर जब से बुद्धिजीवियों ने ‘फेसबुक’ और ‘टि्वटर’ को अपने विरोध का औजार बनाया है, तब से वे अपना विरोध वहीं से जतलाते रहते हैं। चंद बुद्धिजीवि नोटबंदी के खिलाफ शाब्दिक विरोध तो खूब जता रहे हैं मगर इनमें से एक भी जनता की मदद की खातिर उनकी जगह खुद लाइनों में जाकर लगने की हिम्मत नहीं कर पा रहा। भला ऐसे विरोध का क्या मतलब कि ऊपर-ऊपर से ही फां-फूं करते रहो।

चूंकि सोशल मीडिया पर ‘शाब्दिक विरोध’ करना अब ‘फैशन’ बन चुका है तो सब के सब कथित विरोधी मिल-जुलकर विरोध-विरोध खेल रहे हैं। उनमें थोड़ी-बहुत हिरस इस बात की भी है कि ‘तेरा विरोध मेरे विरोध से ज्यादा क्रांतिकारी कैसे!’

विरोध करने का यही सुख है, जब-जहां मौका लगे विरोध करने निकल पड़ो। वो तो गनीमत इतनी रही है कि किसी ने अभी तक मोमबत्तियां हाथों में थामकर विरोध-प्रदर्शन नहीं किया। वरना, यहां तो मोमबत्तियों के बहाने भी विरोधी अपने चेहरे चमका ही लेते हैं।

महीनों से ‘डिनायल मोड’ में पड़े विपक्ष के लिए जनता की परेशानी विरोध का अच्छा अवसर लेकर आई है। जबकि अस्सी फीसद जनता सरकार के फैसले पर अपनी ‘सहमति’ व्यक्त कर चुकी है। हां, उन्हें दिक्कतें तमाम हो रही हैं। बहुतों ने अपनी जानें भी गवाईं हैं, फिर भी, लोग लाइनों में इस विश्वास, इस उम्मीद के साथ डटे हैं कि यह सूरत बदलनी चाहिए। यों भी देश, समाज, राजनीति, सरकार का भविष्य मुठ्ठीभर विपक्षी या कथित बुद्धिजीवि तय नहीं कर सकते, इसे जनता को ही तय करना होता है। हर दफा जीत जनता की ही होती है। आशा है, इस दफा भी जनता ही जीतेगी।

फिर भी, जिन्हें विरोध-विरोध खेलना है शौक से खेलें। पर जनता को न बहकाएं।

Saturday, 26 November 2016

फिदेल कास्त्रो और कॉमरेडो के आंसू

विश्व के बड़े क्रांतिकारी कम्यूनिस्ट नेता फिदेल कास्त्रो नहीं रहे। 90 साल की लंबी पार खेलकर अंततः उन्होंने दुनिया को ‘अलविदा’ बोल दिया। कास्त्रो के न रहने पर क्यूबा और उसके नागरिकों के गम का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। क्यूबा के वो पूर्व राष्ट्रपति ही नहीं बल्कि एक प्रकार से उनके ‘गॉडफादर’ थे। उनका सारा संघर्ष क्यूबा और वहां के नागरिकों की आजादी को समर्पित रहा था। इस लिहाज से क्यूबा के लोगों का अपने नेता की मौत पर ‘दुखी’ होना लाजिमी है।

लेकिन मैं यह नहीं समझ पा रहा कि फिदेल कास्त्रो के न रहने पर हमारे देश के कॉमरेड क्यों इतने मोटे-मोटे आंसू बहा रहे हैं। उनकी मातमी सूरतों को देखकर ऐसा लग रहा है मानो उन्हीं के बीच का कोई बड़ा नेता उनसे बिछड़ गया हो। तमाम कॉमरेडों की फेसबुक पोस्टों, टीवी पर बयानों को पढ़-सुन चुका हूं, सब के सब कास्त्रो के गम में इतने गमजदा हैं कि जुबान तालू से चिपकी-चिपकी जा रही है।

कॉमरेडो के इतनी तदाद में बहाए गए आंसू मुझसे देखे नहीं जा रहे तो सोचा थोड़ा-बहुत महान कम्यूनिस्ट फिदेल कास्त्रो के विषय में पढ़ ही लिया जाए। कास्त्रो के बारे में नेट पर कुछ पढ़ा-जाना। कास्त्रो का जीवन-संघर्ष बहुत बड़ा है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन 17 साल तक बतौर प्रधानमंत्री और 32 साल तक बतौर राष्ट्रपति रहकर उन्होंने राजनीतिक तौर पर अपने देश और वहां के नागरिकों को अपना ‘बंधक’ ही बनाए रखा। क्या इतने सालों में उन्हें राजनीति में एक भी ऐसा चेहरा नजर नहीं आया, जिसे वे देश की बागडोर सौंप सकें?

दरअसल, देश के नागरिकों पर नेताओं का ‘एकछत्र राज’ ऐसे ही ‘तानाशाही’ के रंग मजबूत करता है। उन्हें हर दफा यही लगता है कि उनसे ‘बेहतर’ कोई नहीं। सो, अपने तौर-तरीकों से देश और जनता को हांकते रहते हैं। याद रखें, हमेशा एक ही विचार या व्यक्ति न केवल देश बल्कि वहां की जनता के लिए भी ‘खतरनाक’ साबित हो सकता है। फिर कम्यूनिस्ट जिस विचार को लेकर चलते हैं वहां सिवाय पूंजीवाद के विरोध, आधुनिकता को शक की निगाह से देखने, विपरित विचारधारा से हद दरजे की नफरत करने के अलावा कुछ नहीं। कास्त्रो का वैचारिक रंग-ढंग भी कुछ ऐसा ही था। जिस प्रकार हमारे देश की राजनीतिक पार्टियां ‘परिवारवाद’ की शिकार हैं कास्त्रो भी थे। अगर नहीं होते तो अपने बाद अपने भाई राउल कास्त्रो को क्यूबा की सत्ता क्यों सौंपते? क्या कास्त्रो के पास अपने भाई के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं था?

यह जानना भी कितना ‘हास्यास्पद’ है कि कास्त्रो ने अमेरिका के सबसे बड़े ‘दुश्मन’ रह चुके सोवियत यूनियन से- केवल अपने फायदे के लिए- दोस्ती गांठी। उन्होंने सोवियत यूनियन को अमेरिका के खिलाफ क्यूबा में परमाणु मिसाइल बेस बनाने की जगह भी दी, जिसे बाद में अमेरिका-सोवियत यूनियन आपसी समझौते के आधार पर हटा दिया गया। पर, यह वाकया इतिहास में तो दर्ज हो ही गया न कि कास्त्रो अपने निज हित के लिए कुछ भी कर सकते थे। यों भी, हमने देखा है कम्यूनिस्ट बिरादरी अमेरिका से कथित तौर पर ‘नफरत’ ही करती है मगर अपने परिवार का कोई सदस्य अगर वहां नौकरी करने जाता है तो उसे रोकते भी नहीं। आखिर यह किस टाइप का अमेरिका-विरोध है आपका मिस्टर कॉमरेड?

मैंने पढ़ा कि क्यूबा ने अभी भी उपभोक्तावाद, बाजार और पूंजीवाद से काफी दूरी बनाकर रखी है। आज जब पूरा विश्व बाजार और पूंजीवाद की तरफ आशा भरी नजरों से देख रहा है तब क्यूबा की सत्ता ने अपने नागरिकों को उससे वंचित कर रखा है। जबकि हकीकत यह है कि न किसी देश, न वहां की जनता की गाड़ी बिना बाजार और पूंजी के चल ही नहीं सकती। हालांकि बहुत से लिबरल टाइप लोग बाजार और पूंजी को टेढ़ी निगाह से देखते हैं पर उनका जीवन भी टिका इसी पर है। लेकिन क्यूबा का इन सब से दूर रहना साफ बताता है कि वहां एक किस्म की राजनीतिक (कम्यूनिस्ट) तानाशाही है।

कास्त्रो के बारे में एक धारणा यह भी है कि उनके 35 हजार से ज्यादा लड़कियों के साथ ‘सेक्स संबंध’ थे! यह कितना हास्यास्पद है कि यहां कॉमरेड लोग उनके जाने पर मोटे-मोटे आंसू तो बहा रहे हैं किंतु कास्त्रो की सेक्स लाइफ पर न कोई बात करना चाह रहा है न लिखना। क्यों? क्या डरते हैं कि महान कम्यूनिस्ट नेता का ‘अपमान’ न हो जाए? यह भी तो एक प्रकार की ‘स्वामी-भक्ति’ ही है अपने आका के प्रति। क्या नहीं?

कास्त्रो के चाहने वालो को थोड़ा बुरा जरूर लगेगा लेकिन सच यह है कि उनका सारा संघर्ष, सारी क्रांति उनके कथित सेक्स संबंधों के आगे ‘बौनी’ ही साबित होती है। साथ-साथ यह भी खोज का विषय बनना चाहिए कि कास्त्रो के इतने लड़कियों के साथ जो संबंध रहे वो कौन और किन परिवारों से ताल्लुक रखती थीं? क्या उनमें मजबूर या पीड़ित लड़कियां भी तो शामिल नहीं थीं? हां, यह सही है कि सेक्स हर व्यक्ति का निजी मसला होता है मगर जब वो पब्लिक डोमेन में आए फिर वो व्यक्तिगत नहीं रहता। फिर जिस तरह की कास्त्रो की सेक्स लाइफ रही, उस पर सवाल उठना लाजिमी है। मुझे तो ऐसा लगता है कि कास्त्रो का वामपंथ (समाजवाद) और सेक्सपंथ साथ-साथ चलता रहा।

हालांकि यहां जिक्र करना जरूर नहीं मगर जब बात चल रही है तो उल्लेख कर रहा हूं। महात्मा गांधी की सेक्स लाइफ के किस्से भी खासा चर्चिंत रहे। इसका जिक्र उन्होंने अपनी किताब आत्मकथा सत्य के साथ मेरे प्रयोग में किया भी है। चूंकि यह सब पुरुषों की सेक्स लाइफ (भले ही वे बाद में महान कम्यूनिस्ट नेता या राष्ट्रपिता क्यों न बन गए) से संबंधित था तो ज्यादा शोर-गुल नहीं हुआ। आम अवधारणा भी यही रही है कि सेक्स की सारी स्वतंत्रताएं पुरुषों के पास ही हैं। वहीं अगर कोई स्त्री इन सेक्स स्वतंत्रताओं को खुद अपनाने की कोशिश करती है तो उसे ‘चरित्रहीन’ करार दिया जाता है। उसकी इच्छाओं पर तमाम तरह के सवाल उठाए जाते हैं।

सनद रहे, जब मशहूर लेखिका तसलीमा नसरीन ने अपनी आत्मकथा में अपनी सेक्स लाइफ का जिक्र किया था तब कट्टरपंथियों के साथ भारत के कॉमरेडो को भी काफी मिर्ची लगी थी। काफी बुरा-भला कहा गया था तसलीमा को। जब तसलीमा ने सेमी-न्यूड तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली थी और खुद से छोटे एक युवा के साथ अपने अफेयर को पब्लिक किया था तब भी साहित्य-समाज में बहुत ‘हल्ला’ हुआ था। मुझे हैरानी है, तब एक भी कॉमरेड अपनी वैचारिक गुफाओं में से निकल सामने नहीं आया था तसलीमा का बचाव करने। ये बिरादरी तब भी खामोश थी, जब तसलीमा पर ‘फतवा’ जारी हुआ था और उन्हें पश्चिम बंगाल से देश निकाला दे दिया गया था। बड़े ही अजीब हैं हमारे देश के कॉमरेड। जहां बोलना चाहिए वहां बोलते नहीं। जबकि कास्त्रो की मौत पर ‘मातमजदा’ हैं!

साफ है, सेक्स के दायरे पुरुष के लिए कुछ और स्त्री के लिए कुछ हैं आज भी।

बहरहाल, यह तो मानना पड़ेगा कि विश्व ने एक जग-प्रसिद्ध (पक्के) कम्यूनिस्ट नेता को खो दिया है। जिनके विचार और संघर्ष उनके जाने के बाद भी हमारे मानस-पटल पर कायम रहेंगे। कास्त्रो कास्त्रो ही थे। कभी कास्त्रो ने कहा था- ‘क्रांति कोई गुलाबों की सेज नहीं है. यह भूत और भविष्य के बीच का संघर्ष है।‘

अंत में, मैं फिदेल कास्त्रो का कोई बहुत बड़ा जानकार नहीं। जो बातें मेरे दिमाग में- कॉमरेडों के आंसूओं को देखकर- आईं, उन्हें यहां व्यक्त कर दिया। फिदेल कास्त्रो पर और लिखने के लिए उन्हें अभी और जानना बाकी है।

Wednesday, 11 May 2016

पानी पर हाहाकार

फिलहाल, पानी के मसले ने हमें पानी-पानी कर रखा है। आकाश से लेकर पताल तक पानी के लिए 'हाहाकार' मचा है। आलम यह है कि एक दिन पानी मिलने के बाद अगले दिन मिलेगा या नहीं; कुछ नहीं पता। लंबी-लंबी लाइनों में लोग पानी के लिए यों इंतजार करते दिखते हैं मानो कोई राशन की दुकान हो। अभी तक पानी पाने के लिए 'संघर्ष' हो रहा था, अब लगता है, अगला 'युद्ध' ही पानी के लिए लड़ा जाएगा।

फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं जिनके लिए पानी का कोई मोल नहीं। दिल खोलकर पानी ऐसे खर्च करते हैं मानो पानी की खेती का लाइसेंस हो उनके पास। खुद के नहाने से लेकर गाड़ी की धुलाई तक में बड़ी बेदर्दी से पानी खर्च करते हैं। कभी टोको तो उत्तर मिलता है, वाटर टैक्स दे रहे हैं तो क्या खर्च नहीं करेंगे? हमारे मोहल्ले में एक सज्जन हैं। वे सुबह-शाम खूब पानी डाल-डालकर जब तक अपने घर के बाहर की सड़क धो नहीं लेते, उनकी रोटी हजम नहीं होती। सड़क को पानी से इतना धोते हैं, इतना धोते हैं कि अड़ोसी-पड़ोसी तक भुनभुनाने लगते हैं। मगर क्या करें, पानी बहाना साहब की आदत है सो है।

पानी की बर्बादी के मद्देनजर अब तक बहुत कहा गया है। यहां तक कि कोर्ट ने भी सरकार को फटकार लगाई है। मुंबई में हो रहे आइपीएल मैचों को 30 अप्रैल के बाद वहां से बाहर करवाने के निर्देश भी दिए हैं। इतने पर भी न तो पानी का बेमतलब बहना रूक पा रहा है न किल्लत। लातूर और बुंदेलखंड के हालात तो इतने खराब हैं कि लोगों को नहाने का तो छोड़िए पीने का पानी भी मयस्सर नहीं। लोग खटिया पर बैठकर नहा रहे हैं ताकि अतिरिक्त पानी को स्टोर कर अन्य काम में लिया जा सके।

पानी की कमी के ये दयनीय हालात कोई साल दो साल या महीने दो महीने में नहीं बने हैं। जिस प्रकार से भू-जल का दोहन जारी है। धरती के गर्भ से जिस निर्मता के साथ पानी को मोटरों द्वारा खींचा जा रहा है, उसने आज हमें उस स्थिति में पहुंचा दिया है कि लोग पानी के वास्ते लड़ाई-झगड़े तक पर उतारू हो गए हैं। गांवों-देहातों में जो स्थिति है सो है, शहरों का हाल भी बहुत बुरा है। पानी निकालने के लिए इतनी गहराई तक बोरिंग की जा रही है कि जमीन की आंतें तक सुखने लगी हैं।

शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब गिरते भू-जल स्तर से संबंधित खबरें अखबारों में न आती हों। तमाम तरह के आंकड़ें ये बताने के लिए काफी हैं कि मनुष्य ने अपनी निजी सुविधाओं के लिए जल, जंगल, जमीन का किस बेरहमी से दोहन किया है। मगर फायदा क्या? प्रकाशित आंकड़ों को देखकर, थोड़ा अफसोस व्यक्त कर, सरकार और इंसान की अड़ियल प्रवृति को गरिया कर फिर सब अपने-अपने कामों में लग जाते हैं। चिंताएं महज चिंताएं बनकर ही रह जाती हैं। उन पर अमल न के बराबर ही हो पाता है।

गिरते जलस्तर या पानी की बर्बादी के लिए सरकारें या इंसान अगर वाकई गंभीर होते तो शायद आज हालात ऐसे न होते। यहां तो सब अपनी-अपनी राजनीतिक एवं व्यक्तिगत सुविधाओं को साधने में लगे हुए हैं। नेता बिरादरी जनता की चौखट पर आकर पानी या रोजगार देने का वायदा तो बहुत जोश से कर जाती है लेकिन चुनाव जीतते ही सारे वायदे जुमले में तब्दील हो जाते हैं। चूंकि जनता का काम सरकार और नेता का मुंह ताकना है सो ताक रही है।

एक तरफ पानी की मार, दूसरी तरफ सूखे का वार इस स्थिति में सबसे अधिक बदत्तर हालात तो किसानों के हैं। साहूकारों से लिया कर्ज किसान समय पर चुका नहीं पाता और आत्महत्या कर लेता है। कैसी विडंबना है, देश का अमीर वर्ग बैंक से लिया कर्ज न चुकाए कोई फर्क नहीं पड़ता मगर किसान का हजार रुपया भी माफ करना उसे मंजूर नहीं। मुझे डर है, आगे कहीं आत्महताएं पानी की किल्लत के लिए न होने लगें। क्योंकि हालात ऐसे ही बनते जा रहे हैं।

पानी की बर्बादी को रोकने के लिए कहना, यह काम सिर्फ सरकार या कोर्ट का नहीं बल्कि सबसे पहला हमारा फर्ज होना चाहिए। जहां पानी भरपूर मात्रा में है, वहां के बादिशों को पहल करनी होगी कि वे अतिरिक्त पानी की बर्बादी रोकें। ताकि बचाए गए पानी का इस्तेमाल उन लोगों के लिए हो, जहां पानी की भीषण कमी है।

पानी को बचाने की कवायदें ही लातूर और बुंदेलखंड जैसी जगह के लोगों को जीवन दे पाएंगी। अपने बारे में तो सब सोचते हैं, अब जरा गंभीरता के साथ पानी की कमी से तड़प रहे लोगों के बारे में भी सोचे लें।

Friday, 22 April 2016

शहर भीतर शहर

कभी-कभी मुझे अपना ही शहर 'अनजाना'-सा लगता है। मेरा शहर अब पहले जैसा 'छोटा' नहीं रहा। बढ़ गया है। निरंतर बढ़ता ही चला जा रहा है। एक ही शहर के लोग पुराने शहर को छोड़कर नए शहर में बसने को उतावले हुए बैठे हैं। अपने ही लोगों से इतनी दूर जाकर बस जाना चाहते हैं, जहां पहुंच पाना हर किसी के बस की बात न हो।

नए शहर में पहुंचकर लोगों के बीच आपस में मिलने-जुलने, बातचीत करने की 'इच्छा' भी धीरे-धीरे कर 'समाप्त' हो रही है। अपनों के ही बीच वो इस कदर 'अनजान' से बने रहते हैं, कि उनको देखकर लगता है मानो बरसों बाद देख रहे हों।

लगातार विस्तार पाते शहर और लोगों के दरमियान खत्म होती मोहल्लेदारी 'चिंतनीय' तो है पर कर भी क्या सकते हैं? वक्त की कमी ने ऐसी मार लगाई है कि हम एक-दूसरे से मिलने की बारे में अब कम से कम सोचने लगे हैं। फोन पर या सोशल साइट्स पर बात करने को ही आपस में मिलना मान लेते हैं।

पहले मोहल्लों के 'साझा' सुख-दुख हुआ करते थे। गर्मियों की दोपहर और सर्दियों की धूप में 'मीटिंगें' जुड़ा करती थीं। सब को सबके बारे में सबकुछ मालूम रहता था। आज किसने क्या खाया, क्या बनाया, क्या खरीदकर लाया, किसकी किससे किस बात पर 'अनबन' हुई, किसने कौन-सी फिल्म देखी, किसका अफेयर किस मोहल्ले के लड़के या लड़की के साथ चल रहा है, बिना कुछ छुपाए एक-दूसरे को सब बता दिया करते थे। तब लोगों के दिलों में इतना 'काईयांपन' न था। जितने बाहर से 'पारदर्शी' थे, उतने ही अंदर से भी।

फिर धीरे-धीरे कर लोगों के दिलों-दिमाग में तरह-तरह के बदलाव आते गए। सोच संकुचित होती गई। मोहल्लों को छोड़ लोग नए शहरों में जाकर बसने लगे। मोहल्लेदारी खत्म हो गई। नई पीढ़ी को शायद मोहल्लों और मोहल्लेदारी की साझा विरासत के बारे में मालूम भी न हो। क्योंकि हमने उन्हें वो माहौल दिया ही नहीं। अब तो मोहल्लों की भी कॉलोनियां बन गई हैं, जहां अपने पड़ोसी को पड़ोस का आदमी नहीं जानता। किसी का नाम के साथ पता पूछ लो, तो साफ कह देता है, नहीं जी हम नहीं जानते। एक ही जगह रहकर एक-दूसरे से अनजान बने रहना न जाने शहरों-कॉलोनियों का कैसा विस्तार है ये? कितने सीमित हो गए हैं हम।

इस बात का ताना अक्सर मुझे भी मारा जाता है कि कहां मोहल्ले में पड़े हो। किसी पॉश इलाके में- पुराने शहर से दूर- नए शहर में अपार्टमेंट लेकर रहो। पुराने शहर, पुराने मोहल्लों, पुरानी गलियों में अब कुछ नहीं बचा है। गंदगी बहुत है यहां। जो कहता है, उसके कहे को चुपचाप सुन लेता हूं। अगले के दिल में अगर मोहल्ले, मोहल्लेदारी और गलियों के प्रति अपनापन नहीं पर मेरे दिल में तो है। पूरा बचपन इन्हीं गलियों-मोहल्लों के बीच रहकर-खेलकर बीता है मेरा। हालांकि यह सच है कि अब मोहल्ले केवल कहने भर को बचे हैं। उनमें भी नया शहरी कल्चर पनप गया है मगर फिर भी 'एहसास' तो अभी कायम है न। यही बहुत है मेरे लिए।

मानता हूं कि मैं पुराने शहर के मोहल्ले में रह रहा हूं। पर आजाद तो हूं न। मेरा मन अगर छत पर जाकर पतंग उड़ाने या सर्दियों में धूप सेंकने का करता है तो ये मैं यहां आराम से कर सकता हूं। लेकिन अपार्टमेंट में रहकर ये सब मैं नहीं कर सकता। जिस घर की सिर के ऊपर 'छत' ही न हो। ऐसे घर में रहने से क्या हासिल?

मैं किसी बदलाव का विरोधी नहीं। बदलाव नहीं होगा, तो नई चीजें हमारे बीच कैसे आएंगी। लेकिन शहर के भीतर बसते नए शहर हमें आपस में इतना 'दूर' ले जा रहे हैं, ये सब कभी-कभी 'दुख' देता है। एक ही जगह, एक ही शहर में रहकर हम एक-दूसरे से मिल भी न सकें। ऐसा विस्तार भला किस लायक?

एक शहर के बीच ही कितने नए-नए शहर। कितने नए-नए लोग। कितने नए टाइप का रहन-सहन। फिर भी आदमी की चाहतें, अभी और विस्तार पाने की हैं। फिर हम इस बात का रोना रोते हैं कि हवा विषैली हो रही है। पर्यावरण बद से बदतर होता जा रहा है। प्रकृति की हरियाली, उसके अपनत्त्व को तो हमने शहर पर शहर बना-बनाके लील लिया है। फिर ये रोना क्यों?

शहर के भीतर शहर बसाते चले जाने का सिलसिला शायद कभी खत्म नहीं होगा। क्योंकि हमें अब एक-दूसरे से 'अनजान' बने रहने में मजा आने लगा है।

Thursday, 3 March 2016

कन्हैया के नाम खत

प्यारे कन्हैया,

फिलहाल, अंतरिम जमानत पर जेल की सलाखों से बाहर आने की तुम्हें बधाई। हालांकि बधाई देने के लायक तो नहीं तुम फिर भी इसलिए दे रहा हूं, शायद तुम्हारे दिमाग पर पड़ा 'अतिवाद' का जाला हट जाए।

इसमें कोई शक नहीं कि तुम अब भगत सिंह से कहीं बड़े क्रांतिकारी बनकर उभरे हो। ठीक ऐसे ही, कुछ समय पहले, विश्व के एकमात्र ईमानदार अरविंद केजरीवाल दुनिया के पटल पर उभरे थे। अधिक बतलाने की आवश्यकता नहीं कि केजरीवाल ने भारतीय राजनीति और दिल्ली का कैसा और कितना 'नुकसान' किया। फिलहाल, तो दिल्ली का मुख्यमंत्री बनके चैन की बांसुरी बजा रहे हैं वो।

तुम्हारे हाव-भाव देखके कुछ-कुछ संकेत ऐसे मिल रहे हैं कि तुम संभवता अगले अरविंद केजरीवाल हो सकते हो! क्योंकि बंदा जब राजनीति के 'ग्लैमर' में पड़ जाता है न, तब उसके भीतर 'अपना कद कैसे ऊंचा किया जाए' टाइप तिकड़में ही चलती रहती हैं। उम्मीद हैं, तुम्हारे अंदर भी यही सब चल रहा होगा। और फिर अभी तुम जेल से छूटकर भी आए हो। यों भी, जेल से छूटे बंदे के दिमाग में बहुत ऊंचा क्रांतिकारी होने की खुशफहमी पल ही जाती है। कोई नहीं। पाले रहो।

जेल से बाहर आते ही, तुम्हारे सम्मान में तुम्हारे समर्थकों एवं कथित बुद्धिजीवियों ने जश्न मनाया। बिल्कुल ठीक किया। तुमने काम ही इतना बड़ा और महान किया था कि जश्न से नीचे कुछ भी मनाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अपने देश (ओह! सॉरी-सॉरी ये तो तुम्हारा देश है ही नहीं न) के खिलाफ वो भी जेएनयू में नारे लगाना व टुकड़े-टुकड़े टाइप कहना वाकई बहुत 'दिलेरी' का काम है। और यह सिर्फ तुम ही कर सकते थे।

हालांकि तुम्हारे इश्क में पड़े दीवाने तो अभी तलक यही कह रहे हैं कि तुम ऐसा कर ही नहीं सकते। वो तो कोई और 'बदमाश' टाइप था, जो इतना कुछ अपने देश के खिलाफ 'बक' गया। कोई नहीं यार। कोई नहीं। ये भारत है। यहां तो आदमी के हजार खून तक माफ कर दिए जाते हैं। फिर तुम तो अभी छात्र हो। एक पाकिस्तान है, जिसने विराट कोहली के दीवाने को- अपनी छत पर भारत का तिरंगा फहराने के जुर्म में- दस साल की सजा सुना दी। किंतु तुम्हें इससे क्या। इस मुल्क में तो तुम्हारी सांस यों भी घुट ही रही है न। तुम्हें तो आजादी चाहिए- आजादी। एक तुम ही नहीं बल्कि इस मुल्क के प्रत्येक वाम टाइप विचारक-बुद्धिजीवि-एक्टिविस्ट को आजादी चाहिए। पता नहीं साल-दो साल पहले ये लोग जाने किस मुल्क में रह रहे थे। जहां इन्हें पूरी आजादी मिली हुई थी। अब इनकी हर बात पर 'पहरा' बैठा दिया गया है।

होता है। होता है। जब बिना संघर्ष किए लोग आजादी का लुत्फ उठाने लग जाते हैं न, तब उन्हें अक्सर ऐसे 'काले ख्याल' आने लगते हैं।

मुझे नहीं पता कि तुम्हें इस बात का एहसास है या नहीं कि इस मुल्क को कैसे और किन परिस्थितियों में ब्रिटिश हुकूमत से आजादी मिली थी। कितना-कितना संघर्ष किया था, हमारे क्रांतिकारियों ने इस मुल्क को आजाद करवाने में। अपना घर-परिवार, सुख-सुविधाएं, नौकरी-चाकरी सबकुछ छोड़-छाड़कर केवल मुल्क को आजाद कराने में लग गए थे। न केवल भगत सिंह बल्कि न जाने कितने ही देशभक्तों ने हंसी-हंसी फांसी को अपने गले का हार बनाया और झुल गए। उफ्फ तक न की।

जानता हूं, तुम्हें इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि तुम्हें और तुम्हारे दीवानों को और आजादी चाहिए। एक ऐसी आजादी जिसमें आदमी विचारधारा का गुलाम बना रहे। एक ऐसी आजादी जिसका रंग 'लाल' हो। एक ऐसी आजादी जो अपने ही मुल्क और क्रांतिकारियों का टुकड़े-टुकड़े होंगे कहकर मजाक उड़ाए।

पता नहीं क्यों ये सब मैं तुमसे कह रहा हूं। मैं दरअसल 'बेवकूफ' हूं, जो अपने देश से प्रेम करता हूं। तुम्हारी तरह क्रांतिकारी नहीं, जो जेल से छूटने के बाद भी अपनी आदतों से बाज नहीं आया। जेल से छूटते वक्त कोर्ट की दी हुई हिदायत तक को दरकिनार कर दिया।

चलो। खैर। खत बहुत लंबा हो लिया है। आज तलक इतना लंबा खत तो मैंने अपनी किसी प्रेमिका को न लिखा।

अपनी जिंदगी के मालिक तुम खुद हो। जेएनयू में पढ़ने आए हो। पढ़ाई करो। थोड़ा करियर आदि बना लो। क्रांति करने के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी है मेरे दोस्त।

हां, इतना और सुन लो। क्रांति चाहे तुम कितनी भी कर लो मगर उस भगत सिंह के पैर के अंगूठे के नाखून के बराबर भी नहीं हो पाओगे, जिसने देश की आजादी की खातिर फांसी पर चढ़ने से कोई समझौता नहीं किया।